शांतिनिकेतन
शांति निकेतन
प्रस्तावना
सन अट्ठारह सौ बासठ 1862 ईस्वी में गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर के पिता महर्षि देवेंद्र नाथ टैगोर ने आध्यात्मिक साधना के लिए बंगाल में बोलपुर के पास कोलकाता से लगभग 100 मील की दूरी पर नगर के कोलाहल से दूर शांत और प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर स्थान पर एक आश्रम की स्थापना की थी। सन 1901 ईसवी में टैगोर ने वहां शांतिनिकेतन विद्यालय स्थापित किया ।रविंद नाथ टैगोर ने अपने विद्यालय की स्थापना के लिए स्थान चुनने के विषय में लिखा है:-- "
"मेरे मन में एक आदर्श विद्यालय का रूप था जिसमें घर और मंदिर की एक साथ अनुभूति हो ।जहां शिक्षा उपासना युक्त जीवन का एक अंग बन सके ।मैंने इस स्थान को चुना, जो नगर के सभी आकर्षणों तथा विकृतियों से दूर था और जहां का वातावरण एक पवित्र जीवन की स्मृति से व्याप्त था। जिसने परमात्मा के सानिध्य में अपने दिन बिताए थे।"
शांतिनिकेतन स्थापना के उद्देश्य
*बालकों को जहां ऐसी शिक्षा दी जा सके ,जो प्रकृति से विलग ना हो और बच्चे परिवार के वातावरण का अनुभव करें।
*जहां बालक स्वतंत्रता पारस्परिक विश्वास और उल्लास का अनुभव करें।
*बालकों में भारतीय संस्कृति के प्रति प्रेम उत्पन्न हो सके ।
यहां सभी छात्रों को अपना कार्य स्वयं करने के लिए प्रेरणा दी जाती है ।5:00 बजे सुबह से कार्य आरंभ हो जाता है ।6 :30 मिनट तक सफाई का काम समाप्त हो जाने के पश्चात 2 घंटे अध्ययन कार्य चलता है। दोपहर को मध्य अवकाश हो जाता है उसके पश्चात भारतीय नृत्य ,संगीत ,शारीरिक व्यायाम, खेलकूद आदि की व्यवस्था है ।शिक्षक और छात्रों के संबंध मधुर है।
23 सितंबर सन 1918 को उच्च शिक्षा संस्था शांतिनिकेतन को अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में परिणत कर उसका नाम विश्व भारती रखा गया ।इसके कार्यक्रमों में उस समय रविंद्र नाथ के समक्ष निम्न चार उद्देश्य प्रमुख थे:---
1)--भारतीय संस्कृति का केंद्र:---
भारतीय संस्कृति व आदर्शों के आधार पर सभी जाति धर्म तथा वर्गों के अतीत एवं वर्तमान की शिक्षा प्रदान करना ।
2)--पाश्चात्य संस्कृति का केंद्र:---
प्राचीन संस्कृति से संबंधित कर उनमें घनिष्ठता उत्पन्न करना तथा पाश्चात्य संस्कृति और विज्ञान की अध्ययन की प्रेरणा प्रदान करना
3)--अंतरराष्ट्रीय संस्कृति का केंद्र :---
मानवता एवं विश्व बंधुत्व की भावना का संचार करना तथा विश्व शांति की स्थिति उत्पन्न करना ।
4)--ग्राम पुनर्निर्माण का केंद्र:---
लौकिक समृद्धि को दृष्टिगत रखकर कृषि तथा अन्य कला कौशल एवं उद्योगों का विकास करना एवं समाज सेवा के रूप में जनकल्याण करना ।
रविंद्र नाथ टैगोर ने अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर शिक्षा के जो सिद्धांत निर्धारित किए हैं ,वो निश्चय ही हमारी शिक्षा के इतिहास की महान देन है। वह संक्षेप में निम्न है :---
*बालकों को बहुमुखी शिक्षा देना:----
बहुमुखी शिक्षा उन्हें जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समर्थ बना सकेगी।
* शिक्षा में नवीनता और मौलिकता को महत्व देना :---
इस सिद्धांत के अनुसार आधुनिक शिक्षालयों में प्रचलित रूढ़िवाद का अंत होकर शिक्षा के मौलिक रूप का सृजन कर सकेगा ।
*मानवीय व्यवहार की शिक्षा देना:---
जो मनुष्य शिक्षित हो जाता है उसे हम मानव कह सकते हैं किंतु जब तक उस में सहानुभूति की मात्रा ना आए उसे पूर्ण मात्रा मानव नहीं कहा जा सकता। सहानुभूति का आशय है प्रत्येक मानव से आत्मीयता स्थापित करने की कला एवं मानवीय व्यवहार की कुशलता।
* बालों को पूर्ण स्वतंत्रता देना :----
बालक को ना तो मानसिक शक्तियों के विकास में किसी प्रकार का बंधन हो और ना उसे पारस्परिक व्यवहार में ही किसी प्रकार के बंधन में रखा जाए ,उसे सोच विचार एवं चिंतन करने की पूर्ण स्वतंत्रता हो।
*शारीरिक विकास:---
टैगोर का विश्वास था कि स्वस्थ मन के लिए स्वस्थ शरीर परम आवश्यक है अतः उन्होंने इस बात पर बल दिया के बालक का शारीरिक विकास करना शिक्षा का प्रथम उद्देश्य है उनका कहना था कि शारीरिक विकास के लिए यदि आवश्यक हो तो अध्ययन को कुछ समय के लिए छोड़ देना चाहिए। शारीरिक विकास के लिए टैगोर ने पेड़ों पर चढ़ने,तालाबों में तैरने ,खेलकूद, व्यायाम आदि को आवश्यक बताते हुए पौष्टिक भोजन पर बल दिया
*मानसिक विकास:---
टैगोर के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य मानसिक विकास करना है टैगोर का कहना है कि:---
"पुस्तकों की अपेक्षा प्रत्यक्ष रूप से जीवित व्यक्ति को जानने का प्रयास करना ही सच्ची शिक्षा है।"
इससे कुछ ज्ञान ही प्राप्त नहीं होता अपितु जानने की शक्ति का इतना विकास हो जाता है ।जितना कक्षा में दिए जाने वाले व्याख्यान द्वारा होना असंभव है उनका विश्वास था कि मानसिक विकास तभी संभव है जब वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में प्रत्यक्ष रूप से ज्ञान प्राप्त किया जाए इसके लिए बालक को प्राकृतिक क्रियाएं करने के लिए अधिक से अधिक अवसर मिलने चाहिए ।
*नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास:---
आदर्शवादी होने के नाते टैगोर ने इस बात पर बल दिया कि शिक्षा का उद्देश्य नैतिक तथा आध्यात्मिक विकास होना चाहिए नैतिक शिक्षा के विषय में उन्होंने अपने लेखों में अनेक आध्यात्मिक मूल्यों एवं आदर्शों पर प्रकाश डाला है तथा उनको प्राप्त करने के लिए आत्मानुशासन ,शांति ,धैर्य ,नम्रता आंतरिक स्वतंत्रता तथा आंतरिक शक्ति एवं ज्ञान को परम आवश्यक बताया है। समस्त शक्तियों का विकास के लिए टैगोर यह मानते थे कि बालक के अंदर सभी सुषुप्त शक्तियों का विकास करना ही शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य है। टैगोर एक महान व्यक्ति थे अतः वे व्यक्ति के संपूर्ण विकास को विशेष महत्व देते थे। वे शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को सम्मान तथा स्वतंत्रता प्रदान करना मानते थे। जिससे कि वह पुस्तक विज्ञान के अतिरिक्त अन्य साधनों द्वारा भी स्वतंत्र रूप से अपना विकास कर सके।
*राष्ट्रीयता का विकास:---
रवींद्र नाथ टैगोर राष्ट्रवादी होने के नाते शिक्षा को राष्ट्रीय जागृति का उत्तम एवं सफल साधन मानते थे ।उन्होंने अपने विचारों, लेखों और कविताओं के द्वारा व्यक्तियों को राष्ट्रप्रेम की ओर आकर्षित किया और उन्हें राष्ट्रीय एकता की अनुभूति कराई।
*अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण का विकास :--
टैगोर के अनुसार शिक्षा का अंतिम उद्देश्य बाल्को में अंतरराष्ट्रीय भावना का विकास करना है ।वे अंतरराष्ट्रीय समाज के समर्थक थे और विश्व में एकता स्थापित करना चाहते थे ।शिक्षा के द्वारा बालक को अंतरराष्ट्रीय समाज के बंधन में बांधा जाए जिससे अंतरराष्ट्रीय समाज के विकास हेतु प्रयास करता रहे।
विद्यालय के प्रमुख विभाग एवं उनके कार्य
मृणालिनी आनंद पाठशाला
यह शांति निकेतन के पाठ भवन से संलग्न है इसमें केजी कक्षाएं लगती है।
संतोष पाठशाला
यह शांति निकेतन की शिक्षा शास्त्र से संलग्न है इसमें के जी कक्षाएं लगती हैं।
पाठ भवन (माध्यमिक विद्यालय)
यह शांतिनिकेतन में स्थित आवासीय और सह शिक्षा संस्था है इसमें कक्षा एक से कक्षा 10 तक की शिक्षा की व्यवस्था है।
शिक्षा सत्र (माध्यमिक शिक्षा)
यह श्रीनिकेतन भी स्थिति सह शिक्षा संस्था है इसमें कक्षा 1 से 10 तक की शिक्षा की व्यवस्था है।
उत्तर शिक्षा सदन (उच्चतर माध्यमिक विद्यालय)
यह शांतिनिकेतन में स्थित आवासीय और सह शिक्षा संस्था है इसमें +2 कक्षा 11 12 की शिक्षा की व्यवस्था है।
विद्या भवन (इंस्टिट्यूट ऑफ ह्यूमैनिटीज एंड सोशल साइंस)
यह शांति निकेतन में स्थित है इसमें स्नातक, परास्नातक, डिप्लोमा और सर्टिफिकेट पाठ्यक्रम चलते हैं और परास्नातक के सभी विषयों में शोध की व्यवस्था है ।
शिक्षा भवन (इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस )
यह भवन शांतिनिकेतन में स्थित है और इसमें विज्ञान के स्नातक, परास्नातक ,डिप्लोमा और सर्टिफिकेट पाठ्यक्रम चलते हैं। और स्नातक के सभी विषयों में शोध की व्यवस्था है।
कला भवन( इंस्टीट्यूट ऑफ फाइन आर्ट्स)
यह भवन भी शांति निकेतन में स्थित है इसमें कला में स्नातक, परास्नातक, डिप्लोमा और सर्टिफिकेट पाठ्यक्रम चलते हैं और परास्नातक की सभी विषयों में शोध की व्यवस्था है ।
संगीत भवन (इंस्टिट्यूट ऑफ म्यूजिक डांस एंड ड्रामा)
इसमें संगीत की शिक्षा दी जाती है जो बच्चों के मानसिक विकास के लिए जरूरी है।
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