DRAMA IN EDUCATION ( HINDI MEDIUM)
MEANING OF THE DRAMA
नाटक कला का वो रूप है ,जो व्यक्ति के तनाव एवं दंत की खोज करती है ,यह कला का वह रूप है जिसमें दर्शकों के बीच एक कहानी का प्रस्तुतीकरण, संवादों एवं शारीरिक क्रियाओं के माध्यम से किया जाता है । नाटक के दौरान कहानी का संप्रेषण थिएटर के विभिन्न अवयवों जैसी अभिनय, पहनावा, दृश्यम, प्रकाश, संगीत, एवं संवाद के माध्यम से किया जाता है। नाटक एवं उसके द्वारा संप्रेषित संदेश का बौद्धिक एवं भावनात्मक प्रभाव नाटक के कलाकारों एवं दर्शकों श्रोताओं दोनों पर होता है नाटक एक दर्पण के समान है जिसमें हम अपनी छवि का मूल्यांकन कर सकते हैं एवं मानव व्यवहार तथा भावनाओं को गहराई से समझ सकते हैं नाटक जीवन के सत्यों को उद्घाटित करती कहानियों के द्वारा उन पर विभिन्न समय एवं सांस्कृतिक दृष्टि कोणों को प्रदर्शित करते हुए हमारे दृष्टिकोण को वृहत बनाती है।
AIMS OF DRAMA
नाट्य शिक्षा कला के नाट्य रूप का शक्ति संसाधन के रूप में उपयोग करता है, इसमें अभिनय कर्ता का प्रशिक्षण भी समाहित है जो बच्चों के भौतिक, सामाजिक, भावनात्मक एवं संज्ञानात्मक विकास को बढ़ावा देती है, यह एक बहु संवेदी उपागम है ,जो निम्नलिखित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए उन्मुख होता है---------
*आत्म चेतना में वृद्धि (मन ,शरीर ,आवाज) एवं समन्वय एवं समानुभूति ।
*विचारों के शाब्दिक एवं अशाब्दिक संप्रेषण में रचनात्मक एवं स्वच्छता को बढ़ावा।
* मानव व्यवहार अभिप्रेरणा, विविधता ,संस्कृति एवं इतिहास की गहरी समझ में बढ़ावा ।
नाट्य शिक्षा थिएटर के अवयवों यथा पहनावे ,दृश्य, प्रकाश संगीत ,संवाद, ध्वनियों कहानियों की पुनरावृति आदि का प्रयोग बच्चों के अधिगम अनुभव को बढ़ाने के लिए किया जाता है। नाट्य शिक्षा नाट्य क्रियाओं के दौरान छात्रों को विभिन्न भूमिकाओं का अनुभव कराता है, जो उसके बाद के जीवन में काम आते हैं।
नाट्य शिक्षा के लाभ एवं महत्व
नाट्य शिक्षा का महत्व निम्नलिखित शिक्षकों के अंतर्गत निहित है--------
* छात्रों के आत्मविश्वास में वृद्धि:--
कक्षा में एक नई भूमिका को स्वीकार करना एवं दर्शकों के सामने मंच पर एक पात्र विशेष की भूमिका अदा करना बच्चों को उनके विचारों और योग्यताओं पर विश्वास करने में मदद करता है ।नाटक की क्रिया द्वारा प्राप्त आत्मविश्वास बाद के जीवन में उनके कार्य उनके विद्यालय एवं उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं में शामिल हो जाता है ।
*छात्रों को कल्पनाशीलता में वृद्धि :----
नाटक के क्रम में रचनात्मक विकल्पों की तलाश, नए विचारों को सोचना, परिचित वस्तुओं को नवीन तरीकों से दर्शकों के सामने रखना आदि क्रियाओं बच्चों की कल्पनाशीलता में वृद्धि करती है और जैसा की आइंस्टाइन ने कहा है कल्पनाशीलता, ज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण है।
* समानुभूति का विकास :---
भिन्न भिन्न परिस्थितियों में विभिन्न संस्कृति के कलाकारों के बीच अलग-अलग किरदारों को निभाते हुए बच्चे में दूसरे के दृष्टिकोण को समझने में और उनके प्रति सहनशील बनाने में मदद करता है तथा इस प्रकार से उनकी समानुभूति को बढ़ाता है ।
*सहयोग भाव /सामूहिक भाव को बढ़ावा:---
नाट्यकला प्रतिभागियों के विचारों एवं योग्यताओं को जोड़ता है यह सहयोगात्मक प्रक्रिया में पारंपरिक वैचारिक आदान प्रदान, पूर्वाभ्यास प्रस्तुतीकरण आदि शामिल है ।यह क्रियाएं बालकों में सहयोग की भावना एवं समूह की भावना का विकास करता है जो जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
* एकाग्रता को बढ़ावा :----
नाट्य कला एक बड़े दर्शक समूह के सामने प्रस्तुत किया जाता है। ऐसे में इसके पूर्वाभ्यास ,प्रस्तुतीकरण ।प्रतिभागियों से उच्च स्तर की एकाग्रता अपेक्षित होती है। यह एकाग्रता विचारों, शारीरिक क्रियाओं आदि सभी चरणों पर होती है ।
*संप्रेषण कौशल में वृद्धि एवं वाणी:----
यह सभी के स्तर पर आवश्यक होती है ।एकाग्रता का यह अभ्यास बाद के जीवन में सभी स्तरों पर बालक की मदद करता है ।
*समस्या समाधान कौशलों का विकास :----
नाटक में भाग लेते हुए बच्चे कैसे, किससे, कब, कितना और कैसे संप्रेषण करना है यह सीखते हैं। साथ ही कई बार नाटक के बीच में आई प्रत्याशित परिस्थितियों को संभालने के लिए त्वरित सोच एवं त्वरित समस्या समाधान में मदद करता है।
* खेल/ मस्ती एवं मनोरंजन :-----
नाटक बालकों के लिए खेल ,मस्ती एवं मनोरंजन का कार्य है जो बच्चों की अभिप्रेरणा को बढ़ाता है एवं उनका तनाव कम करता है।
*भावनात्मक अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम:---
नाटक क्रियाएं बच्चों को विभिन्न प्रकार की भावनाओं एवं दमित इच्छाओं को अभिव्यक्त करने का एक माध्यम प्रदान करती है यह बालकों की आक्रामकता एवं तनाव को सुरक्षित रचनात्मक तरीके से कम करने में मदद करती है एवं असामाजिक सामाजिक व्यवहारों की संभावना को कम कर देती है।
* आराम दाई :----
कई नाट्य क्रियाएं बच्चों को शारीरिक मानसिक,भावनात्मक तनाव को अभिव्यक्त करने एवं उत्पन्न तनाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
*आत्मानुशासन को बढ़ावा :----
नाटक विचारों एवं क्रियाओं के प्रस्तुतीकरण के रूप में प्रति फलन है जो बच्चों को अभ्यास एवं धैर्य की कीमत बनाती है नाट्य कला एवं रचनात्मक गतिशीलता बच्चों के आत्म नियंत्रण को बढ़ाता है।
*पारस्परिक विश्वास को बढ़ावा:-----
नाटक की विभिन्न प्रक्रिया के दौरान प्रतिभागियों के बीच होने वाली अंतः क्रिया प्रतिभागियों का नाटक की क्रियाओं में शारीरिक गतिशीलता होती है जो बच्चे के शरीर को क्रियाशील रखते हुए उन्हें लचीलापन समन्वय संतुलन एवं नियंत्रण को बढ़ाती है।
* शारीरिक स्वास्थ्य लाभ :---
अपने प्रति दूसरों के प्रति और उस प्रक्रिया के प्रति विश्वास बढ़ाता है नाटक की क्रियाओं में शारीरिक गतिशीलता होती है जो बच्चे के शरीर को क्रियाशील रखते हुए उनमें लचीलापन समन्वय संतुलन एवं नियंत्रण को बढ़ाती है।
* स्मरण शक्ति में वृद्धि :---
नाटक की क्रियाओं के पूर्वाभ्यास एवं पुनः अभ्यास के दौरान बालक को शब्द भाव भंगिमा, शारीरिक स्थिति आदि सभी का स्मरण रखना होता है एवं उन्हें बार-बार दोहराना होता है जो बच्चे की स्मरण शक्ति बढ़ाने में मददगार है।
* सामाजिक रूप से जागरूक बनाना:----
नाटक की क्रियाएं ,यथा कहानी, कविताएं, दंत कथाएं, खेल आदि बालक को विभिन्न सामाजिक आयामों, सामाजिक समस्याओं, संस्कृतियों के बीच के द्वंद आदि के बारे में सिखा देती है जो बच्चों की सामाजिक, सांस्कृतिक जागरूकता को बढ़ाने एवं उन्हें समझने में उनकी मदद करती है।
* सौंदर्य बोध में वृद्धि:---
नाटक में भाग लेना एवं नाटक देखना दोनों ही क्रियाएं बच्चों में आलोचनात्मक चिंतन एवं उनके सोंदर्य बोध को बढ़ाती है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि नैतिक शिक्षा बालक के सर्वागीण विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
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